तलवार मेरे सरपर लटकती
रही मगर ,
मैंने किसी अमीर को सजदा
नहीं किया ,
लूटना कुबूल किया रहेजन के
हाथ से मगर ,
कमजर्फ रहेबरों पे कभी
भरोसा नहीं किया 👩🏼🦯
मुख्तार कुरेशी, औसा
.
तलवार मेरे सरपर लटकती
रही मगर ,
मैंने किसी अमीर को सजदा
नहीं किया ,
लूटना कुबूल किया रहेजन के
हाथ से मगर ,
कमजर्फ रहेबरों पे कभी
भरोसा नहीं किया 👩🏼🦯
मुख्तार कुरेशी, औसा
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सद्भावनेने राहु या ! (कवी: बशीर शेख "कलमवाला") डोळे भरून पाहावे, मनामध्ये घर करावे, प्रे…
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