7वीं तक पढ़ें हैं लेकिन 14 भाषाओं का है ज्ञान, जहाज बनाने से लेकर बागबानी करने वाले अली मानिकफान पद्मश्री सम्मान से हुए सम्मानित
किसी के ज्ञान का अंदाजा आप उसे देखकर या, उसकी पढ़ाई लिखाई से नहीं लगा सकते हैं। क्या आप सोच सकते हैं कि कोई सातवीं पास शख्स 15 भाषाओं को एक साथ बोल सकता है और उसका ज्ञान रख सकता है। 82 साल के अली मानिकफान इस बात का प्रत्यक्ष उदाहण है। दुबले पतले से दिखने वाले अली मानिकफान (Ali Manikfan) ने बिना पढ़ाई-लिखाई के सफलता की वो कहानी लिख दी है जिसने हर किसी को अंचभित कर दिया है। अली महज 7वीं क्लास तक पढ़े हैं, लेकिन 14 भाषाओं के जानकार हैं। उनका कौशल सेट भाषाओं तक सीमित नहीं है। उन्होंने समुद्री जीव विज्ञान, समुद्री अनुसंधान, भूगोल, खगोल विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, पारंपरिक जहाज निर्माण, शिक्षा, मत्स्य पालन, कृषि और बागवानी के क्षेत्र में अपने ज्ञान का विस्तार किया है। उन्होंने मरीन रिसर्च से लेकर एग्रीकल्चर सेक्टर तक में काम किया है। उनका अधिकांश जीवन लक्षद्वीप के मिनिकॉय आइलैंड पर बीता है। 14 भाषाओं की जानकारी रखने और विभिन्न काम करने के फलस्वरूप भारत सरकार ने अली मानिकफान (Ali Manikfan) को पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया है। एक छोटे से गांव से निकलकर पद्मश्री सम्मान पाने तक का सफर तय करना अली मानिकफान के लिए इतना आसान नहीं था। आइए जानते हैं उनके जीवन का संघर्ष से सफलता तक का प्रेरणादायी सफर।
बचपन से ही किताबें पढ़ने का था शोक
भारत के तटीय क्षेत्र लक्षद्वीप में जन्में अली मानिकफान के आइलैंड पर उस समय स्कूल नहीं था। जिसके कारणवश उनके माता-पिता ने उन्हें कन्नूर में पढ़ाई करने भेज दिया। सातवीं कक्षा तक पढ़ाई पूरी करने के बाद वो वापस आइलैंड लौट आए, क्योंकि वहां तकलीफें बहुत थीं और आइलैंड से दूर रहना भी मुश्किल हो रहा था। इसके बाद वो साल 1956 में कोलकाता चले गए, जहां उन्हें अलग-अलग विषयों की किताबें मिली। अली के अंदर बचपन से कुछ कर गुजरने की इच्छा थी। इसलिए जब वो आइलैंड लौटे, तो इन किताबों के बारे में जानने के लिए वो इन्हें भी अपने साथ ले गए। अली ने इन्हीं किताबों की मदद से कई भाषाएं सीखी।
किताबों के जरिए सीखीं 14 भाषाएं
82 वर्षीय अली मानिकफ़ान (Ali Manikfan) कई विषयों के विशेषज्ञ हैं। उन्होंने किसी भी विषय में औपचारिक प्रशिक्षण नहीं ली है। मानिकफान ने खुद अंग्रेजी, हिंदी और मलयालम, अरबी, लैटिन, फ्रेंच, रूसी, जर्मन सहित कई भाषाओं में पढ़ाई की है। वह सिंहली, फ़ारसी, संस्कृत, तमिल और उर्दू भी जानते हैं। उन्होंने समुद्री जीव विज्ञान, समुद्री अनुसंधान, भूगोल, खगोल विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, पारंपरिक जहाज निर्माण, शिक्षा, मत्स्य पालन, कृषि और बागवानी के क्षेत्र में अपने ज्ञान का विस्तार किया है।
आइलैंड पर मौजूद मछलियों के बारे में जानकारी की एकत्र
अली मानिकफान लक्षद्वीप के आइलैंड पर रहते थे। इसलिए मछलियों को जानने के बारे में भी उनकी रूचि थी। उन्होंने मछलियों को लेकर इतनी खोजबीन कर ली थी कि आइलैंड में मौजूद लगभग हर प्रजाति की मछली के बारे में जान गए थे। इसी का नतीजा रहा कि साल 1960 में उन्हें सेंट्रल मरीन फिशरीज रिसर्च इंस्टीट्यूट (CMIRI) में बतौर लैब अटेंडेंट ज्वॉइनिंग मिली। इस दौरान उन्होंने बहुत रिसर्च की। एक दुर्लभ मछली की खोज भी की, जिसका नाम ही उनके नाम पर अबुदफुद मानिकफानी रखा गया।' 1980 में अली मानिकफान ने रिटायरमेंट ले लिया था।
सीखने के लिए करते गए अलग-अलग काम
अली मानिकफान को हर तरह का काम सीखने का बहुत शौक था। वह नए-नए काम शुरू करते थे। उनके बारे में जानते थे और जब वे पूरे हो जाते थे तो फिर उन्हें छोड़ देते थे। CMIRI में उन्होंने 20 साल तक काफी काम किया। साल 1981 में उन्हें ओमान में एक जहाज बनाने के लिए इन्वाइट किया गया। वहां टिम सिरवेन के साथ मिलकर 27 मीटर लंबा जहाज बनाया, जिसमें लकड़ी और कॉयर का इस्तेमाल किया गया था। जब वो छोटे थे, तब एक गाड़ी बिक रही थी, क्योंकि वो ठीक नहीं हो सकती थी। तो अली ने उस गाड़ी को खरीद लिया। उसे पूरा खोल दिया और फिर बना भी दिया। उससे कई साल वो आइलैंड पर घूमे। उन्होंने तमिलनाडु के वल्लियूर में अपनी 15 एकड़ ज़मीन में एक पवनचक्की से बिजली का उत्पादन किया जो उनका खुद डिजाइन किया है। यहां तक कि उनके पास घर पर एक रेफ्रिजरेटर भी है, जो उनके द्वारा बनाया गया था।
बंजर भूमि को बना दिया हराभरा
अली मानिकफान की रूचि खेती को लेकर भी हुई। तमिलनाडु के तिरुनेलवेली में बंजर पड़ी 15 एकड़ भूमि को उन्होंने स्वदेशी तरीकों से हरा-भरा कर दिया। ट्रेडिशनल मटेरियल से ही रहने के लिए वहां एक घर भी बनाया। मरीन बायोलॉजी, मरीन रिसर्च, जियोग्राफी, एस्ट्रोनॉमी, सोशल साइंस, ट्रेडीशनल शिपबिल्डिंग, फिशरीज, एग्रीकल्चर जैसे तमाम एरिया में अली ने काम किया। आइलैंड में जब पहला स्कूल खुला था तो वहां एक साल बच्चों को पढ़ाने का काम भी किया।
सरकार ने किया पद्मश्री से सम्मानित
अली मानिकफान के कार्यों और उनके सीखने की क्षमता को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री सम्मान से सम्मानित भी किया है। अली मानिकफान को जब पद्मश्री मिलने की सूचना मिली तो उन्हें पता नहीं था कि उन्हें इतना बड़ा अवार्ड मिलेगा। वो इसे पाकर बहुत खुश हुए।
अली मानिकफान का 82 साल की उम्र में भी सीखने का शौक कम नहीं हुआ है। वो आज भी नई-नई जानकारी एकत्र करते रहते हैं। अली मानिकफान ने अपने कार्यों और ज्ञान के जरिए अपनी सफलता की कहानी लिखी है। अली मानिकफान आज लाखों लोगों के लिए प्रेरणास्त्रोत है।

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